रहता हूं किराये की काया में,
रोज़ सांसों को बेच कर किराया चूकाता हूं...!
मेरी औकात है बस मिट्टी जितनी,
बात मैं महल मिनारों की कर जाता हूं...!
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जल जायेगी ये मेरी काया ऐक दिन,
फिर भी इसकी खूबसूरती पर इतराता हूं...!
मुझे पता हे मैं खुद के सहारे
श्मशान तक भी ना जा सकूंगा,
इसीलिए मैं दोस्त बनाता हूँ ...!!
जब मिलती है #inbox पे कुछ कहने से डरती है वो,
कब आऊंगा मैं #Online इस इंतज़ार में रहती है वो,
बड़ी ही शरीफ है बात बात पे शर्माती है वो…
गुस्सा न हो जाऊं कहीं हर बात पे #Sorry बोलती है वो,
मेरे लिऐ आज भी थोड़ा सा वक्त खर्च करती है वो, #Google पर आकर आज भी मुझे सर्च करती है वो...