हर वक़्त कोसते हैं मौत को हम सब,
असल में तो ज़िंदगी जीने नहीं देती
वो सुला देती है आराम की नींद हमें,
पर ज़िंदगी है कि हमें सोने नहीं देती
तिल तिल कर मारने में आता है मज़ा,
मौत को झटके से गले लगाने नहीं देती
धकेल देती है रोज़ खुदगर्ज़ दुनिया में,
एक पल भी वो सुकून से रहने नहीं देती
मरते रहो तथा कथित अपनों के लिये,
कभी खुद के लिये कुछ करने नहीं देती
अफसोस होता है अपने होने पर हमें,
पर ये ज़िंदगी हमें जीने मरने नहीं देती
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