कभी कभार ज़िन्दगी, हमें आँख दिखा देती है
पर उसकी ये धमकी, हमें जीना सिखा देती है
बहुत जुदा है मेरे ज़ख्मों का मरहम साहिबान,
#दर्द रहता है मगर, वो निशानों को मिटा देती है
हम तो कह देते हैं जो आता है #दिल में हमारे,
पर लोगों की समझ, तिल का ताड़ बना देती है
कैसे भूल जाएँ हम उनके दिए ज़ख्मों को यारो,
उनकी तो हर चाल हमें, बद हवास बना देती है
चाहे #ज़िंदगी भी दे दें हम किसी के लिए ,
मगर ज़रा सी भी बात हमें, दुश्मन बना देती है

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