ज़िंदगी यूं डर डर के नहीं गुज़र पाती है
क़यामत की रात भी यूं ही गुज़र जाती है
ज़रा सी देर में बदल जाता है मंज़र
बादलों को चीर कर धूप निकल आती है
लोग तो ज़ख्म देते रहेंगे हमेशा यूं ही
लेकिन हर ज़ख्म की दवा निकल आती है
फूलों सी खुश्बू बिखेर दो दुनिया में यारो
फिर ग़म नहीं गर ज़िंदगी बिखर जाती है

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