ज़िंदगी के सफर में, मैं बिखरता ही रहा
गिर गिर के फिर से, मैं संवरता ही रहा
आते रहे ग़म के तूफ़ां रस्ते में लेकिन,
दिल में हौसले का सूरज, चमकता ही रहा
गर्दिशों में न मिला सहारा अपनों से ज़रा,
मुसाफिर की तरह यूं ही, मैं भटकता ही रहा
पल पल सिमटते गये ज़िंदगी के लम्हें,
न मिला हमसफ़र कोई, मैं मचलता ही रहा
चंद कदमों का फासला ही बचा है अब,
सुकून ही सुकून है जिसको, मैं तरसता ही रहा...
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