अब तो ज़िन्दगी भी, उचाट हो चली है !
उम्र भी तो यारो, कुछ खास हो चली है !
उदास बागवां की तरह बैठा हूँ किनारे,
गुलशन में भी, एक अजीब खलबली है !
खार ही खार दिखते हैं हर तरफ यारो,
न कोई फूल दिखता है, न कोई कली है !
धीरे धीरे घिसट रही है ज़िंदगी,
और आगे और आगे, बस अँधेरी गली है !
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