घर बैठे कभी फूल, मुस्कराने नहीं आते,
बिन ख़ुशी, मोहब्बत के तराने नहीं आते !
नफ़रत को उजड़ा हुआ आशियाँ समझो,
जहां पंछी भी कभी, सर छुपाने नहीं आते !
खुश्क आँखें भी कर देती हैं वयां हाले दिल,
उनको भी दिल के राज़, छिपाने नहीं आते !
क्यों छोड़ा था सफ़र में यूं अकेला उनको,
यारा लौट कर कभी, यार पुराने नहीं आते !
शहर की फ़िज़ाओं से बच कर रहिये दोस्त,
आग लगाने आते हैं लोग, बुझाने नहीं आते !
बेहतर, भूल जाओ गुज़रे लम्हों को दोस्त,
क्योंकि लौट कर फिर, वो जमाने नहीं आते !!!
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