वक़्त को गुज़रना है, वो तो गुज़र जायेगा
ये दौलत का नशा भी, कल उतर जायेगा
समेट रखा है जो तूने ये सब कुछ यारा,
वक़्त की हवा में, सब कुछ बिखर जायेगा
गर डूबते हुए भी कस्ती को संभलोगे तो,
तुम न सही, तो कोई तो पार उतर जायेगा
क्यों तोड़ते हो काँच के मानिंद रिश्तों को,
कोई सा टुकड़ा, दिल में चुभन भर जायेगा
क्यों मदहोश है तू देख के गुलशन अपना,
इसे तो पतझड़, कभी भी वीरान कर जायेगा...
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