मेरी तक़दीर जाने कहाँ सो गयी है
अधरों की मुस्कान कहाँ खो गयी है
जीने की चाहत गयी है ठहर सी
मानो ज़िंदगी हमसे ख़फा हो गयी है
चाहत में एक कर दिये रात दिन
वो चाहत भी हमसे ज़ुदा हो गयी है
हमें गुमान था वो अपने हैं शायद
वो गलतफहमी अब दफा हो गयी है
सोचते थे उन पर है सिर्फ हक़ हमारा
पर उन पर तो दुनिया फिदा हो गयी है
बात यहीं खत्म होती तो शुक्र था पर
उनकी मोहब्बत अब ख़ुदा हो गयी है
You May Also Like





