गर बाज़ार में मिलता प्यार, तो खरीद लेते हम भी,
होता बिकाऊ अगर ऐतबार, तो खरीद लेते हम भी !
न होते वीरान गुलिस्तां न होती ये सर्दियां गर्मियां,
मिल जाता मौसम खुशगवार, तो खरीद लेते हम भी !
न होते कभी गम न बहता आंसुओं का दरिया कभी,
होता खुशियों का गर बाज़ार, तो खरीद लेते हम भी !
न होती ये झंझटें न होता ये बलवों का खेल ख़ूनी ही,
मिल जाता गर कहीं सदाचार, तो खरीद लेते हम भी !
जिन रिश्तों को बनाने में उम्र लगा देते हैं हम लोग,
काश खरीद सकते दौलत से, तो खरीद लेते हम भी !

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