चुप रहना मुनासिब समझा तो खुद बखुद बिखर गए
बिखरने का यह आलम, अब कहें भी तो किसे कहें,
एक लम्बे अन्तराल के बाद वक़्त है मेरे लिए पास उनके
तन्हाई में जो कांटे चुभे है दिल पर, कहें भी तो किसे कहें,
वो सोचते हैं कि हम उन्हें समझते नहीं शायद, ना जानें क्यों
कितने बेबस हैं हम वक़्त के हाथों "कौशिक" कहें भी तो किसे कहें....
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