हम तो उनकी अदाओं को, उनका प्यार समझ बैठे
हम उनकी शराफत को, उनका इज़हार समझ बैठे
वो तो इक गुलाब था किसी और के गुलशन का,
पर हम तो उन्हें अपने आँगन की, बहार समझ बैठे
न सोचा न समझा न अपनी तक़दीर को टटोला,
हम और की चाहत पर अपना इख्तियार समझ बैठे
ले उडीं सब कुछ अचानक बे-वक़्त की वो आंधियाँ,
मगर हम पागल उन्हें, मोहब्बत की बयार समझ बैठे...
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