किसी के वर्षों से टिके रिश्तों को, अहम् खा गया,
तो किसी को अपनी सौहरत का, टशन खा गया !
न कोई भी तैयार है झुकने को अपनी गलती पे,
बस हर किसी को ख़ुदा होने का, भरम खा गया !
अब बहाते हैं अपनी बर्बादियों पर वो आंसू मगर,
सच तो ये है कि उनको उनका ही, करम खा गया !
बो दिए हैं विष बीज इस क़दर आदमी ने यारो,
कि चमन की फ़िज़ाओं को, उल्टा चमन खा गया !
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