जब कोई रिश्ता नहीं तो फिर टोकते क्यों हैं
मैं जिधर जाऊँ मेरी मर्ज़ी मुझे रोकते क्यों हैं
जब ज़िंदगी की राहें हो गयीं अलग अलग
फिर क्या है मेरी मंज़िल मुझसे पूछते क्यों हैं
खुद ही तोड़ दिया #मोहब्बत का धागा यूं ही
फिर अकेले बैठ कर मेरी बातें सोचते क्यों हैं
प्यार का जज़्बा बाकी है अब भी उनमें
वर्ना मुश्किल के हर ठौर पर वे पहुंचते क्यों हैं...

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