बड़ा ज़ुर्म करता हूँ कि, मैं ख्वाब देखता हूँ !
दिल के टूटे टुकड़ों का, मैं हिसाब देखता हूँ !
ये बेरहम दुनिया के बेरहम लोग हैं यारो ,
उनके कारनामों की, मैं किताब देखता हूँ !
गुनाह है गर ज़िंदगी तो क्यों न मार डालो,
वैसे भी क़ातिलों का, मैं इंतज़ार देखता हूँ !
कौन सा ज़िंदा हूँ मैं जो मरने से डर जाऊं ,
रोज़ ही हर मोड़ पे, मैं ज़हरे अज़ाब देखता हूँ !
कौन जी पाता है आज अपने मुताबिक,
हर चेहरे पर अज़ीब सा, मैं तनाव देखता हूँ !

Leave a Comment