जो थे दिल के मेहमान कभी, जाने कैसे निकल गए
पक्के थे अपने रिश्ते, क्यों मोम के जैसे पिघल गए
जाने सब कुछ कैसे हुआ हम जाने कैसे भ्रमित हुए,
जिनको हमने अपना जाना, क्यों गैरों जैसे बदल गए
अच्छा हुआ मिट गए ख्वाब जो पाले थे इन आँखों ने,
कल आँखों के नूर थे हम, पर इकदम कैसे बदल गए
ठीक रहा सब देख लिया जीवन के अंतिम लम्हों में,
यहाँ गिरगिट जैसे लोग मिले, जब चाहा वैसे बदल गए...

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