कभी मेरी छांव तले, पथिकों का शहर हुआ करता था
कभी मेरी बाहों में ,चिड़ियों का घरवार हुआ करता था
तपती किरणों का वो लावा, मुझसे मजबूर रहा करता था
भारी तूफानों से टकरा कर भी, मैं मजबूत रहा करता था
मैने तूफानों को टक्कर दी, जो टकराया समझो हार गया
जीवन में मैं कभी न हारा, बस नन्हें कीडों से हार गया
दुष्टों ने जड़ को खाकर, मेरा हरियाला जीवन छीन लिया
सब साखें मेरी सूख गयीं,पत्तों का भी जीवन छीन लिया
अब खड़ा हुआ हूं ठूठ बना मैं, अब गिद्धों का यहाँ बसेरा है
अब पथिक देख कर दूर भागता, जैसे भूतोँ का यहाँ डेरा है
लोग अगर अब भी ना समझे, तो मेरा सा हाल हुआ समझो
गर छोटे दुश्मन को कमतर समझा, अपना बेहाल हुआ समझो
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