खुशियों का दुश्मन, जमाना क्यों बन बैठा !
जिसको भी चाहा, वही बेगाना क्यों बन बैठा !
रहता है कश्मकश में ज़िन्दगी का हर लम्हां,
ये #जीवन यादों का, #सफरनामा क्यों बन बैठा !
#ज़िंदगी की किताब के बचे हैं आखिरी पन्नें,
उनका पढ़ना भी, एक फ़साना क्यों बन बैठा !
देखा था #ख़्वाब हमने भी हसीन ज़िन्दगी का,
मगर मरना ही, जीने का बहाना क्यों बन बैठा !
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