आदमी से क्या क्या, न करा देता है ख़ुदा,
इंसान को खुला बाज़ार, बना देता है ख़ुदा !
उसे सब कुछ ही बटोरने की चाहत दे कर,
बेचारे इंसान को हैवान, बना देता है ख़ुदा !
कोई तो ओढ़ता है बिछाता है दौलत को,
तो किसी को भिखारी, बना देता है ख़ुदा !
ईमान ओ धरम तो ले लिए वापस उसने,
अब लम्पटों को नायक, बना देता है ख़ुदा !
सिक्के का एक ही पहलू न देखिये ,
कभी कभी बिगड़ी बात, बना देता है ख़ुदा !!

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