कान्धे पर लिये झोला जाने लगे बाजार
लाना था घर के लिए सब्जी भाजी अचार।
तभी श्रीमती जी आईं देख मुझे इठलाईं
तनीक नहीं सकुचाईं और धीरे से फरमाईं।
कहाँ चल दिये आप? कुछ तो बोलिये जनाब
सुन मैने मुख खोला सुमधुर स्वर में बोला।
प्रिये बाजार जाने की तैयारी है
किन्तु ऐन वक्त पर तुम्हें टोकने की यह आखिर कैसी बीमारी है।
सुन कर नाम बिमारी का नथुने उनके फुलने लगे
अब तक थे जो बन्द मुंह हौले से खुलने लगे।
कड़क स्वर में बोलीं जाना है तो जाईये पर जल्दी आईयेगा,
रास्ते में किसी सौतन से नजरे न मिलाईयेगा।
देख तैल की धार मैं थोड़ा झल्लाया
चिल्ला न सका, प्रेम से ये समझाया।
अरे भाग्यवान मैं कभी भी ऐसा दुस्कार्य न करूंगा
एक जन्म की बात क्या सात जन्म बस तेरा ही रहूँगा।
सुन कर बाते मेरी वो थोड़ा शर्माईं हस के वो फरमाईंं।
चलिए चलिए बाते बनाना यही आपका काम है
इसी लिए तो इस शहर में आपका इतना नाम है।
जाईये किन्तु जल्दी आईयेगा
सब्जी खरीदते वक्त मुफ्त का धनिया न भुल जाईयेगा।
जल्द आईये हम आपका इंतजार करेंगे
आज आपके लिए फिर से सोलह श्रृंगार करेंगे।
आपहीं से सलामत मेरीदुनिया यह संसार है
आपहीं पर न्योछावर मेरा तन मन सारा प्यार है।
सुन-सुन कर ये बाते अब तक तो मैं थक चूका था
सच कहूं गर हृदय से तो शायद मैं पक चूका था।
बोला भाग्यवान जाने भी दो वर्ना देर हो जायेगी
सब्जी अगर जो नहीं मिली फिर तूं क्या पकायेगी !!!
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