ये इश्क़ का खुमार, कुछ दिन में उतर जाता है
चाँद सा वो चेहरा, बुझा बुझा सा नज़र आता है
घेर लेती हैं रूसबाईयां ज़िंदगी की,
फिर वो प्यार, आफ़त का सामान नज़र आता है

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