गुनाहों के शहर में, हर चेहरा अनजान सा दिखता है
इंसान की शक्लो सूरत में, इक शैतान सा दिखता है
मुखौटों से नहीं बदलती फितरत आदमी की,
हमें हर कदम उसका, बगुले के ईमान सा दिखता है...
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गुनाहों के शहर में, हर चेहरा अनजान सा दिखता है
इंसान की शक्लो सूरत में, इक शैतान सा दिखता है
मुखौटों से नहीं बदलती फितरत आदमी की,
हमें हर कदम उसका, बगुले के ईमान सा दिखता है...