अपनों से ज़िंदगी में, जब बेहाल हो गये
हर तरफ से हम, जब फटे हाल हो गये
तलाश लिया ठिकाना हमने अंधेरों में,
दुनिया के लिये हम, एक सवाल हो गये
अब सोचता रहता हूं अपनों के करिश्में,
जिनके लिये मरते हुए, कई साल हो गये
या खुदा क्या इन्हीं को कहते हैं रिश्ते,
गर यही सच है, फिर तो कमाल हो गये
शौक से निभाये रिश्ते जिसे चाहत है,
माफ करना यारो, हम तो निहाल हो गये...
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