ज़िन्दगी से उलझने से क्या फायदा
दुनिया को समझने से क्या फायदा
बदली है #दुनिया तो तू भी बदल जा
यूं निरर्थक मचलने से क्या फायदा
क्यों भर रखा है दिल में गुवारों को
यूं घुट घुट के मरने से क्या फायदा
गुज़ारे लम्हों को भला क्या सोचना
अपने आप से लड़ने से क्या फायदा
न तेरे बस की तो छोड़ दे #भगवान पे,
खुद ही #खुदा बनने से क्या फायदा
जो दिया है ख़ुदा ने सब्र कर उस पर
आफतों को खरीदने से क्या फायदा
मिलेगी #मंज़िल भी संभल कर चल
गलत राहों पे चलने से क्या फायदा
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