आज के बच्चे, ज्यादा सयाने हो रहे हैं
वो कुछ अलग से ही, रंग में खो रहे हैं
भूल गये हैं वचपन की कहानियाँ वो,
कुछ तो अपने मां बाप से, दूर हो रहे हैं
चिढ़ाते हैं वे युगान्तर की बात कहकर,
आधुनिकता के नाम पर, बर्बाद हो रहे हैं
सादा सी ज़िंदगी रास नहीं आती उन्हें,
वो अंग्रेजियत के, काफी करीब हो रहे हैं
बुरा नहीं है जमाने के साथ चलना यारो,
पर चादर से बाहर, उनके पाँव हो रहे हैं...
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