आज कल मुस्कराने का, कोई आधार नहीं मिलता
किसी को कैसे कहें अपना, वो आधार नहीं मिलता
फैले पड़े हैं मतलबी रिश्ते हमारी यादों के मलवे में,
पर कहाँ से मिलेगा असली, वो बाज़ार नहीं मिलता
नफरतों की दीवारें खिंच गयी हैं अब हर आँगन में,
कैसे गिराएं इनको, हमें कोई औजार नहीं मिलता
इस कदर ज़हर भरा है हर किसी के दिल में "मिश्र",
पर अफसोस हमें इसका, कोई उपचार नहीं मिलता...

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