हम तो उस आदमी को, यूं ही इंसान समझ बैठे,
उसकी मोहब्बत को ही, अपना ईमान समझ बैठे !
लुटा बैठे उसके लिए अपना सम्मान भी लेकिन,
उसके हर गम को हम, अपना सामान समझ बैठे !
समझाया ज़िंदगी का हमने फ़लसफ़ा एक दिन,
मगर वो नसीहत को, अपना अपमान समझ बैठे !
न आयी समझ उनके ज़िन्दगी की भूल भुलइयां,
वो तो #ज़िंदगी को, ख़रीदा हुआ गुलाम समझ बैठे !
अफ़सोस कि न समझ सके हम फ़ितरत उसकी
हमारी ग़लतफ़हमी थी, कि उसे इंसान समझ बैठे !
ये गुरूर है आदमी का जो सोचने नहीं देता ,
बड़ी ही टेढ़ी खीर है ये, जिसे तुम आसान समझ बैठे !
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