Shanti Swaroop Mishra

921
Total Status

Dilon mein faansle

चलिए मगर, यूं फासले, मत बनाइये
फ़क़त अपने लिए रस्ते, मत बनाइये
हैं और भी मुसाफिर तेरी राहों के यारा
उनसे दुश्मनी के रिश्ते, मत बनाइये
बिना हमसफ़र के न कट सकेंगी राहें
सरपट सी ज़िंदगी में गड्ढे, मत बनाइये
मोहब्बत के सिवा सारे मज़हब हैं झूठे
दिलों को नफरतों के अड्डे, मत बनाइये
जो कुछ भी है पास वो खुदा की नेमत है
झूठी मिल्कियत के सपने, मत सजाइये
भले ही दूर हैं पर अपने तो अपने हैं "मिश्र"
कभी दिलों में उनसे फासले, मत बनाइये

Achhe Din Bhi Aayenge

आते हैं आज मंहगे, कल सस्ते भी आएंगे
कभी चल कर तेरे क़रीब, रस्ते भी आएंगे
न हो ग़मज़दा इन पतझड़ों से अय बागवाँ,
बची हैं गर शाखें, तो फिर से पत्ते भी आएंगे
समय का चक्र तो घूमेगा अपने हिसाब से,
आये हैं बुरे दिन, तो कभी अच्छे भी आएंगे
न हो #उदास देख कर वीरानगी गुलशन की,
परिंदे बनाने नीड़ अपना, फिर से भी आएंगे
न छोड़िये विटप की परवरिश का सिलसिला,
आज आये हैं फल खट्टे, कल मीठे भी आएंगे
#ज़िन्दगी के इस मेले में आएंगे लोग कैसे कैसे,
गर आएंगे कभी शातिर, तो फ़रिश्ते भी आएंगे

Nafrat Thi Dil Mein

नफ़रत थी दिल में, तो इज़हारे प्यार क्यों कर बैठे,
#मोहब्बत के नाम पर, ज़िंदगी निसार क्यों कर बैठे !
जब छोड़ के ही भागना था बीच रस्ते से अय दोस्त,
तो फिर चलने का साथ मेरे, इक़रार क्यों कर बैठे !
जिधर देखो उधर दुश्मन ही तो दुश्मन हैं जहान में,
फिर बेताबियाँ के चलते, खुद पर वार क्यों कर बैठे !
जब पता ही था कि मंज़िलें आसान नहीं हुआ करतीं,
फिर दरम्याने सफर, दिल को बेक़रार क्यों कर बैठे !
चाहतों के मसले पे दिल को संभाल कर रखिये "मिश्र",
अरे आसमां की चाहत में, सितारों से रार क्यों कर बैठे !

Sholon ko mat kurediye

जो दब चुके हैं राख में, उन शोलों को मत कुरेदिए !
जो भर चुके हैं जैसे तैसे, उन घावों को मत कुरेदिए !

बदल देते हैं खेल सारा वो अतीत के नापाक मंजर,
अब गुज़र चुके जो पीछे, उन लम्हों को मत कुरेदिए !

अतीत के गुलशन से बस चुनिए तो फूल खुशियों के,
भाई आये हो छोड़ पाछे, उन ख़ारों को मत कुरेदिए !

इन लफ़्ज़ों की मार से मैंने देखे है कितने ही घायल,
अरे जो बसा रखे है दिल में, उन भावों को मत कुरेदिए !

यहां पे हर किसी को हक़ है अपनी ज़िन्दगी जीने का,
फिर मज़हब के नाम पे, उनके मनों को मत कुरेदिए !

ये जमाना तो सब्र कर लेता है हर तरह से ही "मिश्र",
यूं सियासत के नाम पे, उसके जज़्बों को मत कुरेदिए !

Kisi Ke Dukh Mein

अब किसी के दुःख में, भला कोंन मरा करता है,
अब किसी के हक़ में, भला कोंन दुआ करता है !

सभी तो दिखते हैं मगन अपने ख़्वाबों ख़यालों में,
जफ़ाओं की दुनिया में, भला कोंन वफ़ा करता है !

इक उम्र गुज़र जाती है अपना आशियाँ बनाने में,
कर देते हैं खाक पल में, भला कोंन दया करता है !

क्यों है वो इतना खुश हमें तो ग़म है सिर्फ इसका,
शामिल किसी के ग़म में, भला कोंन हुआ करता है !

अब तलाशते हैं "मिश्र" सब मंज़िलें अपनी अपनी,
यूं मेहरवाँ किसी और पे, भला कोंन हुआ करता है !