Shanti Swaroop Mishra

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Zindagi uljhanon ka shikar

हमने ज़िंदगी को, उलझनों का शिकार बना दिया
लोगों ने अपने कुसूर का भी; गुनहगार बना दिया

कभी ख़्वाहिश न थी कि किसी पे भार बन जाऊं,
मगर ज़िन्दगी की राहों ने, मुझे लाचार बना दिया

न समझ पाया मैं तो इस बेरहम दुनिया की बातें,
मुझे तो मतलब से भरे रिश्तों ने, बेज़ार बना दिया

अपनी इज़्ज़त को बचा के रखा था मैंने जाने कैसे,
पर मेरी तो हर चीज़ को यारों ने, बाजार बना दिया

होता है मुझे अफ़सोस देख कर ज़माने की ये चालें,
कभी तो थे हम सभी कुछ, अब ख़ाकसार बना दिया

सच है कि ज़िंदगी में थोड़ी सी खटपट तो लाज़िम है,
मगर लोगों ने छोटी ख़राश को भी, दरार बना दिया

वो भी इक जमाना था कि सभी साथ होते थे घर पर,
अब मिलन को भी अपनों ने, लंबा इंतज़ार बना दिया

हमने क़रीब से देखे हैं "मिश्र" इस दुनिया के रंग ढंग,
मगर कुछ ने तो इस जमाने को, शर्मसार बना दिया

Badi Ajeeb Hai Zindagi

यूं ही कभी तालियां, तो कभी गालियां मिलती रहेंगी
कहीं पर ग़म, तो कहीं पर शहनाइयां मिलती रहेंगी

बड़ी ही अजीब शय है, ये #ज़िन्दगी की राहें भी यारो,
यहाँ तो कभी दौड़, तो कभी बैसाखियाँ मिलती रहेंगी

आये हो इस दुनिया में, तो बस इतना समझ लो दोस्त,
यहाँ तो कभी भीड़, तो कभी तन्हाईयाँ मिलती रहेंगी

इस #मोहब्बत के नाम पर, कभी बेसब्र मत होना यारा,
यहाँ तो कभी दोस्ती, कभी दुशबारियाँ मिलती रहेंगी

यूं न खेलिए इधर खेल, सिर्फ जीत और जीत के वास्ते,
यहाँ तो कभी जीत, तो कभी नाकामियां मिलती रहेंगी

यारा न करना कभी यक़ीं, किसी को अपना समझ कर,
यहाँ तो कभी शराफत, कभी मक्कारियां मिलती रहेंगी

इस वक़्त की टेढ़ी चालों से, ज़रा संभल के रहना "मिश्र",
यहाँ तो कभी फांके, तो कभी खुशहालियाँ मिलती रहेंगी !!!

Zindagi Saza Kyun Hai

हवा में अनजान सा डर, बसा क्यों है,
हर लम्हा ज़िन्दगी का, खफा क्यों है !
गुज़रती हैं स्याह रातें करवटें बदलते,
ये ज़िन्दगी भी यारो, इक सज़ा क्यों है !
घर में छायी हैं बला की खामोशियाँ,
दर ओ दीवार पर मातम, सजा क्यों है !
दिल के कोनों में बढ़ गयी है हलचल,
बीती यादों का ये वबंडर, उठा क्यों है !
जब चाह थी जीने की न जी सके "मिश्र",
फिर से हसरतों का मेला, लगा क्यों है !

Ab Koi Ehsas Nahi Hota

अब किसी की घात का, अहसास नहीं होता !
ज़ख्मों में उठी टीस का, अहसास नहीं होता !

गालियां भी दे कोई तो शिकवा नहीं हमको,
अब तो किसी अंदाज़ का, अहसास नहीं होता !

कुछ इस कदर बदला है ज़िन्दगी का मिज़ाज़,
कि अब ग़म या ख़ुशी का, अहसास नहीं होता !

परेशान हूँ मैं इतना अपने बीमार दिल से यारो,
अब तो किसी भी चाह का, अहसास नहीं होता !

बरसे हैं दिल पर जुबां के पत्थर कुछ इस तरह,
अब तो किसी भी चोट का, अहसास नहीं होता !

ये मोहब्बतें ये हसरतें सब मन का खेल हैं "मिश्र",
अब किसी की फितरत का, अहसास नहीं होता !!!


 

Naam badnam ho gaya

अपना तो नाम मुफ़्त में,बदनाम हो गया !
बे-सबब ही हसीनों का, अहसान हो गया !

उनकी ज़फाओं से दिल टूट तो टूटा यारो,
मगर मोहब्बत का चस्का, तमाम हो गया !

मंज़िल की तलाश में निकला था मैं नादाँ,
मगर यारों का तज़ुर्बा भी, नाकाम हो गया!

अँधेरी सुरंगों में कुछ इस कदर भटका मैं,
कि अपनों का साया भी, अनजान हो गया !

अपने दर्दों को कब तक मैं छिपाऊँ "मिश्र",
मेरे ज़ख्मों का चर्चा तो अब, आम हो गया !!!