Duniya Mein Khud ko Badalna Padta Hai
जब नयी कोपलें आती हैं तो पत्तों को झड़ना पड़ता है
जब नयी फसल आती है तो पुरानी को खर्चना पड़ता है
ये दुनिया है खुद को बदलने वालों की
गर नहीं बदले तो दुनिया से अकेले को लड़ना पड़ता है
जब नयी कोपलें आती हैं तो पत्तों को झड़ना पड़ता है
जब नयी फसल आती है तो पुरानी को खर्चना पड़ता है
ये दुनिया है खुद को बदलने वालों की
गर नहीं बदले तो दुनिया से अकेले को लड़ना पड़ता है
कभी मेरी छांव तले, पथिकों का शहर हुआ करता था
कभी मेरी बाहों में ,चिड़ियों का घरवार हुआ करता था
तपती किरणों का वो लावा, मुझसे मजबूर रहा करता था
भारी तूफानों से टकरा कर भी, मैं मजबूत रहा करता था
मैने तूफानों को टक्कर दी, जो टकराया समझो हार गया
जीवन में मैं कभी न हारा, बस नन्हें कीडों से हार गया
दुष्टों ने जड़ को खाकर, मेरा हरियाला जीवन छीन लिया
सब साखें मेरी सूख गयीं,पत्तों का भी जीवन छीन लिया
अब खड़ा हुआ हूं ठूठ बना मैं, अब गिद्धों का यहाँ बसेरा है
अब पथिक देख कर दूर भागता, जैसे भूतोँ का यहाँ डेरा है
लोग अगर अब भी ना समझे, तो मेरा सा हाल हुआ समझो
गर छोटे दुश्मन को कमतर समझा, अपना बेहाल हुआ समझो
बड़े नादान हैं लोग जो लोगों से वफा की उम्मीद कर लेते हैं
बड़े मूर्ख हैं लोग जो अपनों से मदद की उम्मीद कर लेते हैं
ये दुनिया है मतलब की प्यारे
अगर दुआ कबूल नहीं होती तो लोग भगवान भी बदल देते हैं
जाम में फंसी मेरी गाड़ी से, जन्नत की एक रूह यूं ही टकराई
मैने पूंछा मन नहीं भरा, जो तू जन्नत से फिर यहाँ चली आई
वो बोली, वहां की आवोहवा में दम घुटता है,
जन्नत में नहीं मिली धुएं की ख़ुराख, तो यहाँ लेने चली आई
भारत देश से जाने वाली हर रूह, वहां यूं ही बीमार पड़ी है
जन्नत के हर हकीम के सामने, एक विकट समस्या खड़ी है
जन्नत में इस बीमारी की दवा ‘प्रदूषण’ कहीं नहीं मिलता,
अतः बीमार हर रूह, भारत के चौराहों पर मुंह बाये खड़ी है
शब्दों के नुकीले दांत, अंदर तक मार करते हैं
घुसते हैं जेहन से, पर ज़िगर पर बार करते हैं
रहजाते हैं पैबस्त होकर दिल के कोने में,
जन्म गुज़र जाता है, पर नहीं वो घाव भरते हैं