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रह के भी साथ उनके, न समझ पाए हम,
दिल की कालिखों को, न परख पाए हम !
भला क्या करें हम उस से गिला
शिकवा,
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मिलना तो चाहे दिल मगर, इन दूरियों का क्या करें,
हैं ज़िगर में पैबस्त जो, उन मज़बूरियों का क्या करें !
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हम तो बस अपनों की दगा से डरते हैं,
तूफ़ान झेल कर भी हवा से डरते हैं !
दुश्मनों से कोई
शिकवा गिला नहीं,
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शिकवा करने गये थे
और इबादत सी हो गई,
तुझे भुलाने की ज़िद्द थी,
मगर तेरी आदत सी हो गई !!!
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अब किसी की घात का, अहसास नहीं होता !
ज़ख्मों में उठी टीस का, अहसास नहीं होता !
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हज़ारों शिकवे हैं ज़िन्दगी से,
किसी और से क्या
शिकवा करें,
ग़म इतने रास आने लगे अब,
किसी और से ज़िकर क्या करें...
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