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संता के घर एक बिल्ली रहती थी जिससे वह बहुत परेशान था।
एक दिन संता उससे तंग आकर कहीं छोड़कर आ गया
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रात की खामोशी
रास नहीं आती,
मेरी परछाईं भी अब मेरे पास नहीं आती
कुछ आती भी है तो बस तेरी याद,
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एक बार ही जी भर के सज़ा क्यूँ नहीं देते ?
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अभी तो आधा ही सफर गुज़रा है अभी तो
रास्ता बाकी है
अभी बामुश्किल यहाँ तक पहुंचे हैं अभी तो फासला बाकी है
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प्यार जैसी चीज़ को तुमने बदनाम कर दिया
तुमने पवित्र से अहसास को नीलम कर दिया
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उनको मैं क्या कहूँ जिसने दिल तोड़ दिया
बिना कुछ बताये मेरा साथ ही छोड़ दिया
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जो चाहा कभी पाया नहीं,
जो पाया कभी सोचा नहीं,
जो सोचा कभी मिला नहीं,
जो मिला
रास आया नहीं,
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जो औरों की राहों में कांटे बिछाते हैं
वो अपना भी
रास्ता कभी न पाते हैं
जो रोशनी बुझाते हैं औरों के घर की,
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फूलों की महक या कांटों की ख
रास लिखूँ
या अपनों से बिगड़ते रिश्तों की खटास लिखूँ
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खुद ही तय करते हैं मंज़िलें,
रास्ता भी खुद बनाते हैं
जीते हैं अपनी शर्त पर, अपनी दुनिया भी खुद बनाते हैं
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