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तक़दीर ने मदारी की तरह नचा दिया हमको
फिर फिर उठा के फिर फिर गिरा दिया हमको
हम तो किसी को ना भुला पाये आज तक,
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प्यार की दास्तां, किसी से भला क्या कहिये
खुदगर्ज़ दुनिया से, अपने अज़ाब क्या कहिये
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क्या करें ये ज़िंदगी अब रास नहीं आती
मर जाते पर
बेवफा मौत पास नहीं आती...
सोचा कि मैं भूल जाऊं सब कुछ मगर
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क्या सोच कर उसे दिल में बसाया हमनें
क्यों उसका हुस्न दिल पर लगाया हमने
उस पत्थर दिल ने बदल दिया रुख अपना
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तेरी #दोस्ती ने दिया सकून इतना ,
की तेरे बाद कोई भी अच्छा ना लगे ,
तुझे करनी हो
बेवफाई तो इस अदा से करना ,
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मोहब्बत के नाम से डर गया हूँ मैं
अपनी ही नज़रों में गिर गया हूँ मैं
बेवफाई का जिक्र क्या करना "मिश्र"
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कैसे भूल जाऊं मैं हर पल मुस्कराना उनका
कभी कभी न मिलने के लिये बहाना उनका
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ज़ख्मों का दर्द, छुपा के देख लिया हमने
अपने ज़िगर को, जला के देख लिया हमने
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न पूंछो हमसे कि, सहने की हद कितनी है
कर ले ज़फ़ा तू भी, करने की हद जितनी है
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उनके लिये भला मैं, क्या अल्फाज़ कहूँ
उन्हें
बेवफा कहूँ, या कि धोखेबाज़ कहूँ
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