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यारा कहाँ गयी वो
बात, वो ज़िंदा दिली तेरी
कैसे हुई ग़मों से बोझिल, प्यारी सी हंसी तेरी
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आदमी से क्या क्या, न करा देता है ख़ुदा,
इंसान को खुला बाज़ार, बना देता है ख़ुदा !
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ज़िंदगी तो बेसुरा, एक राग बन गयी,
जीने की तमन्ना, अब राख बन गयी !
हम हम न रहे तुम तुम न रहे दोस्त,
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बेकार अपने वक़्त को, गंवाया मत करिये
हर जगह अपनी टांग, फंसाया मत करिये
कोई भी किसी से कम नहीं है आज कल,
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निकल पड़ते हैं जज़्
बात, क्या करें
दिल में अटकी है हर
बात, क्या करें
उमड़ता रहता है दर्दे दिल अंदर ही,
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