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उम्र भर संभाली जो मोहब्बत की तानें,
कब टूट जाएं ये किसको पता है
मोहब्बत की
राहों में वफ़ाओं के साये,
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इन फरेबों से भरी दुनिया में, ऐतबार है दोस्ती,
अपनी मंज़िल पाने के लिये, सह सवार है दोस्ती,
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जब कोई रिश्ता नहीं तो फिर टोकते क्यों हैं
मैं जिधर जाऊँ मेरी मर्ज़ी मुझे रोकते क्यों हैं
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क्यों मुश्किल में है ज़िंदगी, ज़रा सोचिये
क्यों अपने, पराये हो गये, ज़रा सोचिये
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#सोनिया: बेटा
राहुल,
अब तुमने पार्टी का क्या सोचा है?
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राहुल : मम्मी, कल ही तो कांग्रेस हारी है
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गर हिस्से में आयी तन्हाई तो क्या करेंगे
उनकी यादों में नींद न आई तो क्या करेंगे
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मुसाफिर हूँ दोस्तो, अपनी
राह चला जाऊँगा
अकेला था सफर में मैं, अकेला चला जाऊँगा
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ये ज़िंदगी के खेल भी कित्ने अजीब होते हैं
सच्चाई की
राह में हमेशा काँटे नसीब होते हैं
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अपनी धुन में मस्त मुसाफिर, बीता रास्ता भूल गया
क्या छोडा किसको छोडा, सब अपना पराया भूल गया
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गर हौसला है तो मंज़िल ज़रूर मिलती है
घोर अंधेरे के बाद रोशनी ज़रूर मिलती है
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